शीतला सातम: तिथि, मुहूर्त, पूजा, महत्व और कथा

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Sheetala Satam

शीतला सातम त्यौहार श्रावण मास के 7 वें दिन, अर्थात् कृष्ण जन्माष्टमी के एक दिन पहले, और रांधन छठ के एक दिन बाद मनाया जाता है। इसे शीतला सप्तमी या शीतला सातम भी कहा जाता है। माता शीतला की पूजा करने के लाभों को स्कंद पुराणम में समझाया गया है, जिसमें शीतला माता स्तोत्र शामिल हैं, जिन्हें भगवान शिव द्वारा लिखित ‘शीतलाष्टक’ के रूप में भी जाना जाता है।

शीतला सातम का महत्व

शीतला सातम को देवी शीतला के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्हें खसरा और चेचक की देवी के रूप में जाना जाता है। यह चेचक या इसी तरह की बीमारियों से सुरक्षा प्राप्त करने के लिए मनाया जाता है। यह भारत के लोगों, खासकर गुजरातियों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है।

शीतला देवी को देवी दुर्गा का एक अवतार माना जाता है, शीतला देवी को हिंदू धर्म में शक्ति के रूप में बहुत माना जाता है और उनकी पूजा की जाती है। देवी शीतला को एक प्राकृतिक उपचारक कहा जाता है, और संस्कृत में, शीतला नाम का सही अर्थ है जो ठंडा करता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में कई नामों से देवी की पूजा की जाती है। कई हिंदू, बौद्ध और आदिवासी समुदाय उसकी पूजा करते हैं, और उसे माँ और माता शब्द से संबोधित करते हैं।

शीतला माता मुख्य रूप से उत्तर भारतीय राज्यों में लोकप्रिय हैं। वह भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती के रूप में भी पूजनीय और प्रतिष्ठित हैं। हालांकि, दक्षिण भारत में, देवी का अवतार मरियम के रूप में माना जाता है कि उन्होंने शीतला माता की भूमिका निभाई है और उनकी पूजा द्रविड़ों द्वारा की जाती है।

शीतला सातम् 2020 तिथि और पूजा का मुहूर्त

शीतला सातम 10 अगस्त 2020, सोमवार को मनाया जाएगा। पूजा का मुहूर्त सुबह 06:42 से शाम 07:05 बजे के बीच है।

शीतला सातम की विधि और पूजा

शीतला सातम की परंपरा का अनुसरण बसोडा और शीतला अष्टमी के रूप में किया जाता है जो उत्तर भारत में होली के बाद मनाई जाती हैं। शीतला सातम की सबसे महत्वपूर्ण विधि उस दिन भोजन नही पकाना  है। परिवार के सदस्यों को ताजे भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए, और इसलिए, शीतला सातम से ठीक पहले रांधन छठ के दिन, ज्यादातर गुजराती भोजन बनाते हैं। यह भोजन पर्याप्त होता है जिसे अगले दिन लिया जाता है, यानी शीतला सातम के दिन। इस दिन निम्नलिखित विधिओ का पालन किया जाता है:

शीतला सातम के पावन अवसर पर, भक्त सूर्योदय से पहले एक झील या नदी में स्नान करते हैं और शीतला माता की एक मूर्ति स्थापित करते हैं। फिर इसे हल्दी पाउडर, चंदन पेस्ट, सिंदूर या कुमकुम का उपयोग करके सजाया जाता है।

जो भक्त पैसे का प्रबंधन कर सकते हैं, वे शीतला माता की एक स्वर्ण मूर्ति भी बनाते हैं जो उनके वाहन (एक गधा) पर बैठी होती है।

हथेलियों को जोड़े और आरती के साथ पूजा करके शीतलादेवी को श्रद्धांजलि अर्पित करें।

पूजा के बाद, 16 किस्म के नैवेद्यम के साथ फल चढ़ाएं। कुछ भक्त आटा और गुड़, या घी (बटर) के साथ मिश्रित चावल भी चढ़ाते हैं जो रांधन छठ पर तैयार किया जाता है।

देवी का आशीर्वाद पाने के लिए लोग शीतला माता व्रत कथा या कहानी पढ़ते हैं। रीति-रिवाज़ों के अनुसार इस दिन केवल एक समय भोजन करना चाहिए। लोग शीतला माता के मंदिर भी जाते हैं, जहां हल्दी पाउडर और बाजरे का उपयोग करके देवी की पूजा की जाती है।

राजस्थान में, लोग इस त्योहार को पूरे उत्साह और अपार श्रद्धा के साथ मनाते हैं। साथ ही, एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, और इस दिन कई संगीत कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

शीतला माता व्रत कथा या कहानी

शीतला सातम त्योहार से जुड़ी कई पौराणिक कहानियां हैं। सबसे अधिक प्रासंगिक कथा में इंद्रायुम्ना नाम के एक महान और धर्मी राजा का उल्लेख है। उनकी एक पत्नी थी जिसका नाम प्रमिला और एक पुत्री शुभकारी थी, जिसका एक पति राजकुमार गुनवन था। राज्य में हर कोई शीतला सातम मनाता था और पूरी निष्ठा के साथ उपवास करता था। शुभकारी ने एक बार अपने पिता के शाही प्रांत की मुलाकात ली थी और भव्य समारोह में भाग लिया था और रिवाज के तहत उपवास का पालन किया था।

शुभकारी कुछ दोस्तों के साथ विधि करने के लिए एक झील पर गइ। हालांकि, उन्होंने अपना रास्ता खो दिया और किसी भी व्यक्ति से मदद मांगी जो भी आस-पास दिखे। उन्हें एक बूढ़ी महिला ने झील में जाने का सही रास्ता दिखाया, जिन्होंने पूजा विधि के बाद उपवास विधि करने में भी उनकी सहायता की। शीतला माता उनकी पूजा प्रक्रिया से प्रभावित थीं और इसलिए उन्होंने शुभकारी को वरदान दिया। हालाँकि, शुभकारी ने देवी से कहा कि वह उस वरदान का तभी उपयोग करेगी जब उसे सच में कोई जरूरत होगी।

राज्य में वापस जाने पर, शुभकारी और उसके दोस्त एक गरीब ब्राह्मण परिवार के पास आये। परिवार के सदस्य गहरे शोक में थे क्योंकि साँप के काटने से उनके परिवार के एक सदस्य की मृत्यु हो गई थी। यह दृश्य शुभकारी से देखा नही गया, और इसलिए उन्होंने शीतला माता से अपने वरदान के लिए मृत ब्राह्मण को जीवन में लाने के लिए प्रार्थना की। देवी ने प्रार्थना के बाद ब्राह्मण को जीवन प्रदान किया। यह घटना सभी लोगों के दिलों में गहराई तक चली गई, और उन्होंने शीतला सातम त्योहार मनाने का अर्थ और महत्व समझा। तभी से सभी ने शीतला माता की पूजा करना शुरू कर दिया और सच्ची श्रद्धा और पवित्रता के साथ व्रत का पालन किया।


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